वैसे इस समय भारत के अलग-अलग कोने में चुन-चुन कर ऐसे लोगों को गिरफ़्तार किया जा रहा है जो कुछ महीनों पहले तक इस देश की मोदी सरकार द्वारा बनाए गए विवादित नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे अभियान का नेत्तृत्व कर रहे थे। इन गिरफ़्तारियों के ख़िलाफ़ भी पूरे भारत में कई शहरों में विरोध-प्रदर्शन हुए हैं और साथ ही कोविड-19 के कारण बड़े स्तर पर विरोध-प्रदर्शन न होने के कारण लोग सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म से लगातार इन गिरफ़्तारियों का विरोध कर रहे हैं। विरोध करने वालों में भारत की बड़ी-बड़ी हस्तियां शामिल हैं।
इस बीच जामिया समन्वय समिति (जेसीसी) की सदस्य सफ़ूरा ज़रगर की ज़मानत अर्ज़ी ख़ारिज करते हुए दिल्ली की एक अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने कहा कि जांच के दौरान एक बड़ी साज़िश देखी गई और अगर पहली नज़र में साज़िश, कृत्य के सबूत हैं, तो किसी भी एक षड्यंत्रकारी द्वारा दिया गया बयान, सभी के ख़िलाफ़ स्वीकार्य है। अदालत ने कहा कि भले ही आरोपी (ज़रगर) ने हिंसा का कोई प्रत्यक्ष कार्य नहीं किया, लेकिन वह ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के प्रावधानों के तहत अपने दायित्व से बच नहीं सकती हैं। अदालत ने कहा, ‘सह-षड्यंत्रकारियों के कृत्य और भड़काऊ भाषण भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत आरोपी के ख़िलाफ़ भी स्वीकार्य हैं। वहीं ज़रगर के वकील ने कोर्ट से अपील की कि कम से कम ज़रगर को मानवीय आधार पर ही ज़मानत दे दी जाए क्योंकि वह 21 हफ़्ते की गर्भवती हैं और पॉली सिस्टिक ओवरियन डिसऑर्डर (पीसीओडी) से पीड़ित हैं। वकील ने कहा कि कोविड-19 संकट के कारण उनकी स्थिति और ख़राब हो गई है और उन्होंने इस ओर भी इशारा किया कि दिल्ली के तीन जेलों के क़ैदियों को कोरोना संक्रमण हुआ है। लेकिन अदालत ने तो जैसे पहले से ही तय कर लिया था कि ज़रग़र को ज़मानत नहीं देनी है, ज़रगर के वकील की किसी भी बात को न मानते हुए न्याय के मंदिर में बैठ न्यायमूर्ती ने गर्भवती महिला को जेल में ही रखना उचित समझा।
वहीं ज़रगर के वकील ने दावा किया कि सफ़ूरा को जानबूझकर मामले में फंसाया जा रहा है जबकि मामले में कथित आपराधिक साज़िश में उनकी कोई भूमिका नहीं है। वकील ने दावा किया कि जांच एजेंसी सरकार की नीति या क़ानून को मंज़ूर नहीं करने वाले छात्रों को फंसाने के लिए असल में झूठा विमर्श गढ़ रही है। इससे पहले दिल्ली पुलिस ने पहले दावा किया था कि ज़रगर ने सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के दौरान जाफ़राबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे सड़क को कथित रूप से ब्लॉक किया था और लोगों को भड़काया था, जिसके बाद इलाक़े में दंगे हुए। पुलिस ने दावा किया कि वह उत्तर पूर्वी दिल्ली में फरवरी में सांप्रदायिक दंगे भड़काने के लिए ‘पूर्व नियोजित साज़िश’ का कथित रूप से हिस्सा थीं।
कुल मिलाकर 'जब सैयां भये कोतवाल तो डर काहे का', एक ओर पूरी दुनिया ने वीडियो के ज़रिए यह देखा कि सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के नेताओं, सांसदों और विधायकों ने दिल्ली चुनाव के समय कैसे-कैसे भड़काउ बयान दिए और स्वयं दंगे के लिए उकसाने वाले कपिल मिश्रा जैसे नेताओं को तो दिल्ली हाईकोर्ट की फटकार भी लगी और कार्यवाही का आदेश भी दिया गया लेकिन, सत्ता में बैठे उनके आक़ाओं ने तो इंसाफ़ का तराज़ू अपने हाथों में पहले से ही ले रखा था इसलिए होना वही था जैसा वह चाहते हैं। यही कारण है कि एक ओर गर्भवती महिला को केवल शक की वजह से जेल में रखा जाता है जबकि उसके पेट में पलने वाले बच्चे का तो कई गुनाह भी नहीं है और दूसरी ओर जिन्होंने दंगा भड़काने और खुले तौर पर पुलिस को धमकी भी दी थी उन्हें सुरक्षा के साथ आज़ाद घूमने की छूट मिली हुई है।